Almighty God
Hindi

परमात्मा और उनका वास

By The Counterviews
Read this insightful article from The Counterviews

(यह लेख परमात्मा और उनके संभावित वास का एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है I लेखक आधुनिक विज्ञान के नजरिये से परमात्मा की परिकल्पना करने की कोशिष कर रहा है जो बेशक अपूर्ण है I आम व्यक्ति के समझ में परमात्मा की धारणा को व्यक्त करने का यह एक प्रयास मात्र है)

परमेश्वर का स्वरुप

हमारा सनातन और कुछ अन्य धर्म एवं आस्थाएँ भी परमात्मा में परम विश्वास रखती है I उपनिषद से ली गयी निम्नलिखित वैदिक मन्त्र विष्णु सहस्त्रनाम का भाग है जिससे भगवान् विष्णु की किसी अमुक अवस्था का एक काल्पनिक वर्णन मात्र मिलता है जो शायद श्रद्धा-भक्ति में लीन ऋषि-मुनियों द्वारा दिया गया है I याद रहे भगवान् विष्णु सृष्टि के पालक हैं और शेषनाग की सय्या पर रत होते हुए भी सृष्टि का संचालन कर रहे होते हैं I

"शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं, विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् ।

लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं, वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम् ॥"

लगभग सारे धर्म और आस्थाएँ ऐसा मानती है कि पूरे ब्रह्माण्ड का संचालन परमात्मा की कृपा से ही होता है I सनातन के भगवान् विष्णु, बौद्ध धर्म के 'ब्रह्म', सिख के गुरुओं द्वारा दिखाए गए 'परब्रह्म' और जैन के २४ तीर्थांकरों द्वारा दिखाए गए मोक्ष का पथ आदि सैद्धांतिक रूप से समान अवधारणाएँ हैं I उधर अन्य विचारधाराओं में पारसियों के 'अहुरा मज़्दा' कुछ सनातन से मिलते जुलते हैं लेकिन देवों (इंद्र) को नकारात्मक भूमिका में देखते है I अब्राहमिक आस्थाओं में ईसाई के सर्वशक्तिमान ‘God’ हैं तो वहीं यहूदी 'यावे YHWH को एकमात्र अविभाज्य शक्ति मानते हैं लेकिन वे सब अन्य धर्म-आस्था से खिलाफत या नफरत नहीं करते I अब्राहमिक आस्थाओं में सिर्फ इस्लाम ऐसा मजहब है जो किसी भी अन्य धर्म या आस्था मानने वालों को अपने अल्लाह का दुश्मन मानता है और उसे जबरन या तो धर्मांतरण के लिए वाध्य करता है या मार डालने का वैचारिक कटुता देता है (पढ़ें “Gross Fundamental Rights Violations in Many Verses of Quran”, https://thecounterviews.in/articles/gross-fundamental-rights-violations-in-many-verses-of-quran/) I

कई विचारधाराएँ यह मानती है कि ब्रह्माण्ड के कण-कण में परमात्मा की कृपा शक्ति निहित है I स्वयं परमात्मा का क्या आकार है कोई नहीं जानता I कई ग्रंथों ने उन्हें निराकार और ॐकार माना है तो वहीं कई ऋषियों-मुनियों ने आम मनुष्य की संकुचित आध्यात्म समझ के लिए, मनुष्यों से हजारों गुना ज्यादा तेज रखने वाले अनेकों मष्तिष्क, आँखों, कानों और हाथों वाले साकार ब्रह्म के रूप में परिकल्पना की जिसको अलग-अलग चित्रकारों द्वारा अलग अलग रूप दिया गया I अनेकों मष्तिष्क, अनेकों आँख-कान से अनेकों प्राणियों की वेदनाएँ-संवेदनाएँ देखते-सुनते हैं और अनेकों हाथ से उसका निराकरण भी करते हैं I 

जहाँ ब्रह्म के निराकार व अनंत रूप को समझनें वाले ज्ञानी यह भली-भाँति जानते हैं कि हर देवी-देवता उसी एक परमब्रह्म के अनेकों कलाओं के अलग-अलग कार्यरूप हैं, वहीं साकार रूप में देखने समझनें वाले उन्हें ब्रह्माण्ड के सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, जीवात्मा के सृजक-विनाशक महेश तथा समस्त जीवात्माओं का भरण पोषण करने वाले विष्णु-रूप मानते हैं I ये सब या तो मूर्त रूप में साकार ब्रह्म स्वरुप को मानने वालों को माँ लक्ष्मी, सरस्वती, गायत्री, सावित्री देवी आदि शक्तियाँ व अन्य स्वरूपों में, या फिर अग्नि, वरुण, इन्द्रादि देवों के पौरुष रूप में उन्हें अनुभव करते हैं I मूर्त रूप में अनेकानेक देवी-देवता असल में एक ही परमात्मा के कुछ विशिष्ट कला लिए अलग-अलग स्वरुप हैं I लेकिन जब समय-समय पर उनका जैविक अवतार होता है तो वे सब मूर्त रूप में दशावतारों के अलग-अलग काल खंड में अलग-अलग निमित्त के लिए प्रकट होते रहे हैं I

अज्ञानी सनातन धर्म में देवी-देवताओं की संख्यात्मक गिनती करते हैं तो यह गिनती हजारों, लाखों या करोड़ों में चली जाती है लेकिन ज्ञानी लोग जानते हैं कि वे सब एक ही परमात्मा के अलग-अलग कार्य-स्वरुप हैं, उन्हीं के अनेकों कलाओं में से हैं I हाँ ! एक प्रश्न कई बार उठा है कि क्या पौरुष की क्षमता वाले और स्त्रीत्व की संवेदनशीलता वाली कलाएँ एक ही परमात्मा के हैं या उस परमात्मा के दो सामान दीखनें वाले पर आसमान गुणात्मक भागों में से हैं जिसे महादेव ने अर्धनारीश्वर के रूप में प्रकट किया था I

आत्मा और परमात्मा

श्रीमद भागवत गीता में ज्ञानी जनों को परमात्मा के अनंत स्वरुप की एक झाँकी मिलती है I ज्यादातर धर्म और आस्थाएँ मानती हैं कि हर जीव में जिस आत्मा का निवास होता है वह परमात्मा का ही अति अतिसूक्ष्म अंश है I किसी जीव में आत्मा का जितना अंश होता है उस जीव या प्राणी में शायद उतना ही दैविक / आध्यात्मिक प्रभाव होता होगा I आत्मा के वही अंश शायद निर्धारित करते होंगे कि अमुक जीव या प्राणी में परमात्मा का कितना अंश और उनकी कितनी कलाएँ विद्यमान हैं I परमात्मा में निहित ६४ कलाओं में से हर कला अपने आपमें सम्पूर्ण हैं I इन कलाओं के अंश मात्र से प्राणियों में अनुकूल परिस्थितियों में आध्यात्म गुण के मात्र वे कुछ अंश आते होंगे जो परमात्मा ने उस प्राणी को दिया होगा, जो प्रायः सम्पूर्ण न हो I उन कलाओं का कितना अंश किसी प्राणी को मिला, उसी से यह तय किया जा सकता है कि उसमें कितनी आध्यात्मिक गुण होंगे I 

किसी भी जीव में आत्मा का जितना भी अंश होगा, वही यह निर्धारित करता होगा कि उसमें अलग अलग गुण आने के कितने शाक्य या क्षमताएँ हैं I इन गुणों में करुणा, धैर्य, क्षमा, न्याय, निष्पक्षता, वैराग्य, आध्यात्मिक शक्तियाँ, अजेयता, उदारता, सौंदर्य, नृत्य, गायन, ईमानदारी, सच्चाई आदि गुणों में अंश मात्र से लेकर परम निपुणता हैं जो देवों को मानव से अलग बना देतीं हैं I अगर अवतारी जीव व देवी-देवताएँ अन्यान्य गुणात्मक कलाओं को ग्रहण किए ऐसी जल धाराएँ हैं जो क्रमशः बड़ी होतीं, एक-दूसरी नदियों से मिलती हुई अंततः अथाह समुद्र में समा जाती हैं तो वहीं जीवात्मा जल के वह बूँदें हैं जिन्हें कई बाधाओं को पार कर पहले किसी छोटी से छोटी जल धारा में मिलना पड़ता है और तब वह उन नदियों के मार्फ़त समुद्र में मिलती हैं I लेखक के सोच में जीवात्मा, अवतार, देवी-देवता और परमात्मा क्रमशः वही जल बूँदें, छोटी जल-धाराएँ, नदियाँ और समुद्र रूपी जल हैं I

संभव है कि जल-बूँद रूपी जीवात्मा की किसी जलश्रोत तक मिलने तक की यात्रा में जो भटकना पड़ता है वही शायद प्रेत योनि में भटकना हो और जब वह जलबूँद किसी शुद्ध जल-श्रोत से मिलती हो वह स्वर्ग का प्रतीक हो और अशुद्ध जलश्रोत नर्क का प्रतीकात्मक I यहाँ शायद श्राद्ध कर्मों का महत्त्व हो जो उन बूँद रूपी आत्मा के लिए शुद्ध जल का मार्ग प्रशस्त करती-करवाती हो I यहीं उन कुछ तीर्थ स्थानों का भी महत्त्व हो सकता है जिसके बारे में माना जाता है कि वहाँ मृत्यु के उपरान्त अमुक आत्मा किसी शुद्ध या शुद्ध जलश्रोत रूपी प्रवाह में समाकर क्रमशः स्वर्ग या नर्क में जाता हो या फिर सीधा समुद्र में लीन होकर मोक्ष प्राप्त करे I

परमात्मा के अवतार 

सनातन धर्म में मान्यता है कि परमात्मा की ६४ कलाएँ हैं जिसका अतिसूक्ष्म अंश ब्रह्माण्ड के प्रायः सभी प्राणी को जीवंत बनाती है I ये कलाएँ ही निर्धारित करती है कि अमुक जीव या प्राणी में क्या-क्या दैविक / आध्यात्मिक गुण होंगे I परमात्मा के यही अंश निर्धारित करते होंगे कि उसमें कितनी शाक्यता या क्षमताएँ होंगी I भगवान् कृष्ण में १६ कलाएँ विद्यमान थीं जबकि भगवान् राम में १२ I ये दोनों ही अवतार युग-द्रष्टा थे और क्रमशः त्रेता और द्वापर के द्योतक भी I वैसे भगवान् परशुराम भी त्रेता में ही अवतरित हुए थे I भगवान् विष्णु अपने मतस्यावतार, कूर्म और वराह अवतारों में एक ही कला से संपन्न माने जाते हैं। वहीं वे नृसिंह और वामन अवतारों में दो कलाओं से संपन्न माने जाते हैं। परशुराम अवतार में वे तीन कलाओं से युक्त माने गए हैं I 

भगवान् बुद्ध का कलियुग के पूर्वार्ध में जन्म हुआ था और उनमें कुछ ऐसी अद्भुत आत्मा का वास था कि महल से बाहर निकलकर तत्कालीन सामाजिक व्यवस्थाओं में उन्होंने अपनी एक अलग लीग बनाई जिसमें अहिंसा को प्राथमिकता दी गयी थी और सरलता से जीवन यापन का एक नया पथ प्रदर्शन किया जिसका 'बौद्ध धर्म' के रूप में विश्व में काफी प्रचार प्रसार हुआ I उनमें कितनी कलाएँ थीं इसका वर्णन तो लेखक को कहीं नहीं मिला लेकिन हमारे ग्रंथों में इतना तो अवश्य लिखा है कि भगवान् विष्णु के दशावतारों में से वे एक थे I उन्होंने आध्यात्म का जो नया ज्ञान दिया और जो तेजी से चहुँ-दिशाओं में विभिन्न शैली के जीवन यापन करने वालों द्वारा स्वेक्षा से ग्रहण किया गया, वह अपने आप में किसी दैविक चमत्कार से कम नहीं है I

परमात्मा की ६४ कलाएँ क्या क्या हैं?

अक्सर लोग आध्यात्मिक कलाओं और जैविक कलाओं में अंतर करना भूल जाते हैं I जहाँ संगीत, नृत्य, जीवन-मूल्य, भौतिक ज्ञान, वास्तु रचना, दैनिक कर्म की अलग-अलग विधाएँ आदि-आदि सांसारिक व जैविक कलाएँ हैं I इन कलाओं का परम व सर्वश्रेष्ठ परिकल्पना एक या अधिक दैविक कलाओं में की जा सकती है I उदाहरण के लिए एक-एक देवता एक या अधिक दैविक कलाओं के निरूपण हैं I उदाहरण स्वरुप माँ सरस्वती शिक्षा-ग्रहण की परम कला की स्वरूपा हैं I इसी तरह माँ लक्ष्मी धनोपार्जन की, भगवान् विश्वकर्मा भौतिक सृजन की, भगवान् इंद्र अनेकानेक शक्तियों में सामंजस्य रखने की कलाओं की पराकाष्ठाएँ हैं I साथ ही यह भी नहीं भूलना चाहिए की ये सब देवी-देवता सर्व-गुण संपन्न परमात्मा के एक या अधिक कलाओं के द्योतक हैं I 

कुछ चमत्कारी लोग और थोपी गयी आस्थाएँ

युग-युगांतर से अलग-अलग काल खण्डों में भगवान् ने अलग अलग कलाओं से परिपूर्ण अवतार तो लिया ही है साथ ही परमात्मा ने कुछ लोगों को आत्मा के इतने अंश दे दिए कि वे या तो महामानव या अलग-अलग चमत्कारों से सुसज्जित चमत्कारी प्राणी बन गए I ऐसे ही एक महामानव भगवान् महावीर थे जिन्होंने जैन धर्म की नीव रखी जो अहिंसा का द्योतक है और जिसके अनुयायियों की संख्याँ काफी है I सनातनियों में तो अनेकों त्रिकालदर्शी और चमत्कारी व्यक्तियों के कई उदाहरण हैं I यह अति उल्लेखनीय है कि सनातन धर्म में ही "विश्वेदेवाः 'विश्व के सारे देवी देवता'" को मान-मर्यादा देने और मानने की प्रथा रही है और यही कारण है कि कुछ जनजातियाँ जो असुरी शक्तियों को मानती पूजती है, उसे भी अपनी आस्था मानने की छूट देता है I भारत भूमि पर तो अनेकानेक कलाओं से विभूषित अनेकानेक चमत्कारी विभूतियों ने जन्म लिया है जो अपने आप को भगवान् नहीं वल्कि उनका ऐसा भक्त माना जिनपर भगवत कृपा हुई थी I 

इसी तरह १६वी शताब्दी के मुस्लिम उत्पीड़न की अवधि में सनातन धर्म में अत्यधिक अवसाद आ गया था जब आम लोग अपने धर्म से उदासीन होने लगे थे I अंधविश्वास, रीति-रिवाज, प्रथा-परम्पराओं से निम्न वर्ग के लोग विचलित होते जा रहे थे तब खत्री कुल के नानक देव जी में, मुस्लिम गवर्नर के भंडारी थे, एक दैविक अनुकम्पा आयी और उन्होंने अपनी कविता के माध्यम से एक निर्गुण आराधना शुरू की जिसमें गुरु को प्रथम रखा गया I छठे गुरु ने एक नए 'सिख पंथ' की स्थापना की जिसमें अन्यान्य गुरुओं द्वारा रचे भजनों का संकलन कर एक पुस्तक बनाई गयी जिसका नाम 'गुरु ग्रन्थ साहिब' रखा गया I इसमें भगवान् राम, माता सीता, हरि, गोविन्द गोपाल, ब्रह्मा विष्णु महेश आदि सभी की वंदन है I परन्तु उन सब तक पहुँचने का माध्यम गुरु बताया गया है I

 उधर दूसरी तरफ पश्चिमी देशों में एक चमत्कारी व्यक्ति 'जीसस' का जन्म हुआ जिसके स्पर्श मात्र से कई रोगी और पीड़ित ठीक हो जाते I उसमें अवश्य ही कुछ दैविक / आध्यात्मिक शक्ति होगी I उन्होंने अपने अनुयायियों को सन्देश दिया कि विश्व को चलाने वाला एक सर्वशक्तिमान भगवान् है जिसके इशारों पर सबकुछ होता है I यह बात और है कि बाद के शताब्दियों में उसके अनुयायी उसी को भगवान् समझनें लगे I जीसस के जन्म के ६ शतक बाद अरब की बर्बर भूमि पर एक ऐसा व्यक्ति अपने आप को पैगम्बर घोषित कर लिया जिसनें ज्यादातर तलवार के नोक पर तत्कालीन दर्जनों संघर्षरत अरब जनजातियों का या तो नरसंहार कर दिया या अपने द्वारा थोपे गए आस्था का अनुकरण करने के लिए वाध्य कर दिया I एक के बाद एक, बहुतेरे देशों को उसने धर्मांतरण करने के लिए वाध्य कर दिया I अपने अतिरिक्त किसी और धर्म या आस्था मानने वालों को वह या तो अपना धर्म बदलनें को मजबूर कर देता या फिर उसे मार डालता I यह असुरी प्रथा आज भी कमजोर देशों पर हॉबी होने की कोशिश कर रहा है I 

परमात्मा का वास

आत्मा का वास तो हर जीव जंतुओं में है लेकिन परमात्मा का वास कहाँ होता होगा ? क्या स्वर्ग में या कहीं और ? स्वर्ग या नर्क का पता भी कोई नहीं जानता (पढ़ें "स्वर्ग केहेन, नर्क केहेन?", page 37-42; विदेह ४१२ म अंक १५ फरबरी २०२५ (िर्ष १८ मास २०६ अंक ४१२) https://mail.google.com/mail/u/0/#inbox/FMfcgzQZTVqKqQXLLlJbDfClBgsDGKDs?projector=1&messagePartId=0.2) I यह माना जाता रहा है कि स्वर्ग धरती के उत्तर और नर्क दक्षिण दिशा में है लेकिन सैकड़ों वर्षों में विज्ञान और वैज्ञानिकों को इसका कोई प्रमाण नहीं मिला है I न ही हिमालय पर और न ही अंतरिक्ष में I आत्मा, प्रेतात्मा या पितरों के आत्माओं का निवास चंद्रमा के उर्ध्वभाग में माना गया है। वे आत्माएँ मृत्यु के बाद एक से सौ वर्षों तक मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच की स्थिति में माने जाते हैं और पुनर्जन्म के लिए पृथ्वी पर परमात्मा द्वारा कभी भी भेजे जा सकते हैं I आकाश और अंतरिक्ष में धरती से ६०० किलोमीटर ऊपर पृथ्वी के निचली पोलर ऑर्बिट में रोज हजारों वैज्ञानिक उपग्रह सैकड़ों चक्कर लगा रहे हैं तथा लगभग ३६००० किलोमीटर ऊपर GEO में सैकड़ों उपग्रह लगातार धरती और इसके परिधि के सभी तरह पैनी दृष्टि रखे हैं लेकिन किसी अलौकिक या दैविक उपस्थिति-ऊर्जा का कोई सुराग नहीं मिला है और न ही किसी असीम ऊर्जाश्रोत रूपी परमात्मा का I सूर्य का परिक्रमा कर रहे पृथ्वी के लगभग वृत्ताकार पथ का भी अनेकों स्कैन किया गया है लेकिन आत्मा, परमात्मा, स्वर्ग या नर्क होने का कोई संकेत नहीं मिला है I वहीं आधुनिक समय में चन्द्रमा के चहुँ ओर भी कई उपग्रह दशकों से लगातार चक्कर लगा रहे हैं और उसके उर्ध्व भाग में किसी ऊर्जा के किसी श्रोत का कोई संकेत नहीं मिला है I

दूर अंतरिक्ष में देख रहे रेडार जहाँ एक छोटे से पत्थर को भी देख लेती है वहीं किसी अलौकिक ऊर्जा या परमात्मा का लाखों किलोमीटर दूर तक कोई अता-पता नहीं I अंतरिक्ष में स्थापित नासा के 'हबल' और यूरोप का 'जेम्स वेब' टेलिस्कोप तो अरबों किलोमीटर दूर अंतरिक्ष में देख सकते हैं लेकिन परमात्मा या वैसी कोई ऊर्जा-श्रोत नहीं देख पाए हैं I वैसे इसकी संभावना हो सकती है कि परमात्मा को कोई आँख या भौतिक यंत्र न देख पाए जैसा कि गीता में वर्णन है I तो फिर भगवान् वास कहाँ करते हैं ? भगवान् शंकर का कैलाश पर्वत पर वास माना जाता रहा है लेकिन अभी तक इसका कोई साक्ष्य नहीं मिला है I हाँ ! वहाँ गए लोगों ने एक अलग अनुभूति का वर्णन अवश्य किया है जो अत्यधिक उंचाईयों पर हवा में ऑक्सीजन के कम होने से भी महसूस किया जा सकता है I

 कुछ ग्रंथों में ‘क्षीर सागर’ का वर्णन है जिसमें सहस्रों फन वाले शेषनाग पर आसीन भगवान् विष्णु को बताया गया है लेकिन वह क्षीर सागर है कहाँ ? कम से कम धरती या इसके आस पास मंगल या शुक्र ग्रहों पर तो नहीं है I अगर हम भगवान् के निराकार स्वरुप को लेकर बात करें तो वे किसी ऐसे ऊर्जा-श्रोत की तरह हो सकते हैं जो आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण या सेंसर की पकड़ में नहीं आ रहा, लेकिन यह बिना साक्ष्य का मात्र एक अंदाजा है I आज जब अंतरिक्ष में जाकर प्रयोग और खोज करना संभव है, भारतीय पद्धति आखिर ऐसा कोई रिसर्च क्यों नहीं करती ? किसे पता कि आने वाले समय में एक ' ॐकार’ रूपी प्रकाश या किरण मिल जाए जो आत्मा और परमात्मा का परिचायक हो ?

ऐसी अनुसंधानों को करने के लिए एक और सूत्र का सहारा लिया जा सकता है I हर वर्ष के सितम्बर के आस-पास सनातनियों की मान्यता है कि 'पितृपक्ष' में उनके सारे पूर्वजों की आत्मा पृथ्वी के अत्यंत करीब होती है जिन्हें दक्षिण दिशा में जल का अर्घ्य दिया जाता है I तो क्या उन दिनों पृथ्वी अंतरिक्ष के किसी ऐसे भाग से गुजर रही होती है जहाँ आत्माओं का संग्रह हो या परमात्मा से नजदीकी ? याद रहे कि सनातन धर्म के अत्यधिक पर्व त्यौहार वर्ष के इसी काल-खंड में होता है जैसे गणपति पूजा, रक्षा बंधन, अनंत चतुर्दशी, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, जिमूतवाहन पूजा, दुर्गा पूजा, लक्ष्मी पूजा, दीपावली अदि अदि I

सारांश

लगभग सभी धर्म व आस्थाएँ यह मानती है कि हर जीव में आत्मा का निवास है और हर आत्मा परमात्मा द्वारा संचालित है I लेकिन यह कोई नहीं जानता कि आत्मा-परमात्मा किस रूप में, कहाँ केंद्रित है ? ६४ कलाओं वाले उस परमात्मा की लीला अपरम्पार है जिसका हम अनुमान भी नहीं लगा सकते I गीता में जैसे श्री कृष्ण द्वारा कहा गया है कि हजारों सूर्य-रूपी उस ऊर्जा श्रोत को मानव की आँखें देख नहीं सकती तो क्या कोई ऐसा वैज्ञानिक यंत्र नहीं बनाया जा सकता जो आत्मा-परमात्मा या ' ॐकार’ रूपी ऊर्जावान प्रकाश-किरण के होने का प्रमाण दे सके ? हम तुच्छ मानव के ऐसे प्रश्न बहुतेरे है लेकिन उत्तर बहुत कम I